भारत में करोड़ों लोग Insurance क्यों नहीं लेते?
सोचिए, सरकार खुद आपकी पॉलिसी सस्ती कर दे, फिर भी आप बीमा न लें – अजीब लगता है ना? लेकिन भारत में फिलहाल यही हो रहा है।
22 सितंबर 2025 से बड़ा बदलाव हुआ। पहले हेल्थ इंश्योरेंस के प्रीमियम पर 18 प्रतिशत GST लगता था, यानी हर पॉलिसी पर लगभग पांचवां हिस्सा सिर्फ टैक्स में चला जाता था। सरकार ने इसे पूरी तरह हटा दिया — अब इंडिविजुअल हेल्थ पॉलिसी और फैमिली फ्लोटर प्लान पर 0 प्रतिशत GST लगता है। मतलब वही कवरेज अब पहले से सस्ता मिल रहा है। सीधी भाषा में समझें तो अगर पहले 12 हज़ार का प्रीमियम था, तो उसमें से करीब 2 हज़ार रुपये सिर्फ टैक्स के बचने लगे।
लेकिन इतनी बड़ी राहत के बावजूद तस्वीर ज़्यादा नहीं बदली। भारत की बीमा पैठ अब भी 4 प्रतिशत के आसपास सिमटी हुई है, जबकि दुनिया का औसत करीब 7 प्रतिशत है। यानी सस्ता होने के बाद भी करोड़ों घरों में बीमा अभी भी “बाद में लेंगे” वाली लिस्ट में ही अटका है।
अब सवाल है — जब सरकार ने रास्ता आसान कर दिया, तो लोग अब भी पीछे क्यों हैं?
पहली वजह वही पुरानी है — जानकारी न होना। बहुत से परिवारों को यह पता ही नहीं कि GST हटने से उनका प्रीमियम अब कम हो चुका है। जो लोग “बीमा महंगा है” सोचकर टाल चुके थे, उनमें से ज़्यादातर को इस बदलाव की खबर तक नहीं है।
दूसरी वजह भरोसे की कमी है। टैक्स भले ही कम हो गया हो, लेकिन क्लेम मिलने में देरी और कागज़ी झंझट को लेकर बना पुराना डर अब भी वैसा ही है। लोग कहते हैं, “पैसा तो बच गया, पर क्लेम मिलेगा भी या नहीं, यही डर है।”
तीसरी वजह है प्राथमिकता की लड़ाई। जिस घर का बजट पहले से राशन, किराया और स्कूल फीस में उलझा हो, वहां भले प्रीमियम कुछ सौ रुपये कम हो गया हो, फिर भी वह पैसा तुरंत किसी और ज़रूरी खर्च में चला जाता है। सस्ता होना काफी नहीं होता, जब तक बीमा को ज़रूरी न समझा जाए।
यह कहानी बताती है कि नीति बदलने से आधी लड़ाई जीती जा सकती है, पूरी नहीं। जब तक लोगों तक सही जानकारी और भरोसा दोनों नहीं पहुंचेंगे, GST की छूट भी सिर्फ कागज़ों पर एक अच्छी खबर बनकर रह जाएगी — असली फायदा घर-घर तक नहीं पहुंचेगा।

